गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

tanu thadani तनु थदानी. इक उम्र गुजरती है

जो वक्त ने पढ़ाया , मास्टर जी क्या पढ़ाते !
जीवन  गुजारा  हमने , धोते- नहाते- खाते !

धरती पे सबका जीवन, शायद हसीन होता ,
तमीज से ही हम जो , पहचाने अगर जाते !

गंर आईने  में अपना, जो चित्र नहीं  दिखता ,
केवल चरित्र दिखता , तो हम भी सुधर जाते !

हम  जानवर  हैं  कैसे , कि  पेट के लिये ही ,
रब  का दिया  वो  तोहफा , ईमान बेच आते !

हम सभ्यता के आशिक, मंगल व चाँद छाने ,
जो  दिल  हमारे  पास , उसे भूल भूल जाते !

माँ सच है, पिता सच है , भाई बहन भी सच है ,
वो मौत भी तो सच है , हम क्यूँ हैं भूल जाते ?

पत्थर जमा किये क्यूँ ? कंकर जमा किये क्यूँ ??
इक  उम्र  है  गुजरती , ये  अक्ल  आते  आते !

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