मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

tanu thadani क्या ये सियासत है तनु थदानी

खुद  ही  का  घर  है लूटता ,क्या  ये  सियासत  है ?
अपनों  का  साथ  छूटता ,  क्या  ये  सियासत  है ?

आते   चुनाव   आदमी    का  , जिस्म   ओं  ज़मीर,
इक   बुलबुले   सा  फूटता , क्या  ये  सियासत है ?

सौ   दिन   में   गरीबी   हटायेंगे   कहा   था   ये,
सचमुच ही वो सब  झूठ  था ,क्या ये सियासत है ?

हमने  जगह   दी   पलकों  पे , पर   यहाँ   उनका ,
सर  पे  हमारे   बूट था  , क्या  ये  सियासत  है ?

वोटर  फटी  कमीज  में  ,  नेता  जी   सदन   में ,
उनके  बदन  पे  सूट  था ,क्या  ये  सियासत है ?

मेहनत  की   पेट  बांध  के , रुपया  गया  गिरता ,
सब  कह रहें  थे भूत था , क्या  ये सियासत है ?

कुत्ते  ने  काटा , जब  की  मैं , बैठा  था  ऊंट   पे ,
 ये किस तरह का ऊंट था ,क्या  ये  सियासत है ?

रविवार, 22 दिसंबर 2013

Tanu Thadani बचपन मेरे तू लौट आ तनु थदानी

क्यूँ  घूमते, हो  कर  बड़े , अपना अहम्  ले हाथ में !
पिटते रहें, खुद ही से हम, फंसते खुद ही के घात में !

जब कद बढ़ा, तो दिल हमारा,क्यूँ सिकुड़ छोटा हुआ,
सिर को फंसाओ मत अरे , अब दिल की बात बात में !

हम   रौशनी   में  डूब  के , अंधे  बने , होना  ही  था ,
सब लुट गया , जो था जमा , फिर उम्र वाली रात  में !

ब्यापारियों  की नस्ल में , हम आदतन  ही  ढ़ल  रहें ,
क्यूँ  भूलते , कि खुश थे हम, मासूमियत  की जात में !

होटल  गयें  कभी   नहीं , अच्छा   हुआ  गरीब  थें ,
हमने  तो  लूटा  है  मजा , संग मां  के दाल - भात  में !

मुझको बना मालिक, जहाज़ों का ,भले कागज के ही ,
बचपन मेरे  तू  लौट आ  , किलकारियों  के साथ में !

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

tanu Thadani मेरी बिटिया तनु थदानी

तू  मेरी  जिंदगी को  आ  के , मुक्कमल  कर दे !
मेरी बिटिया  मेरी सांसो  में आ,  जीवन भर दे !

सभी  कुछ  है  मेरे  मकान  में , बस  तेरे  सिवा ,
अपनी किलकारियों से आ के ,उसको घर कर दे !

तेरा   वजूद   मेरे   ख्वाब  में   है , रग - रग  में ,
स्वयंम्  को ख्वाब से निकाल के , धरा पे धर दे !

तेरे बाबुल  का जीवन,  बिन तेरे तो , रिक्त सा है ,
मुझे मासूम  छम - छम  से  भरा , मेरा ही घर दे !

तुझे  इक  बार  तो , बाँहों के , झूले  में  झुलाऊं ,
खुदा से  मौत के पहले , यही  मांगु , ये  वर  दे !

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

tanu thadani उस मौलवी को क्या कहूं तनु थदानी

मस्जिद में हाथ  जोड़ कर,  कुछ बुदबुदाया था !
तिरछी  हुई नजरें सभी , थप्पड़  भी खाया  था !

बेहद  अजीज  वो  था , बेहद  पसंद  थी   खीर  ,
फिर  भी  गया  न  ईद में , उसने  बुलाया   था !

मां  ने  कहा  था  बेटा  वो , गौ- मांस  खाते  हैं ,
छोटा था मैं ,मुझको समझ में ,कुछ न आया था !

 वो  भी  था  मजा  चाहता ,अम्मी  ने किया बंद,
होली  में   रंग   खेलने  को  , छटपटाया     था !

बातों  ही  बातों  में जो मेरा , जिक्र  था  आया ,
मुझको पता  चला  मुझे ,  काफिर  बताया  था !

  वो  मेरे   एतराज  पे , बोला  क्यूँ   दुःखी  हूं ,
उसको तो  मौलवी ने ही ,ये  सब  सिखाया था !

उस मौलवी को क्या कहूं , इक  शब्द की खातिर,
उस  शब्द से यारी  गयी , कुछ भी न भाया था !

नफरत  के  लिये  हम वजह, जो  धर्म को  माने ,
खोजो  ये नाम  हिंदू - मुस्लिम,  कौन  लाया था !

इंसान  हैं , इंसान  बन  के , रह  न  पायें  क्यूँ ?
भगवान  ने  क्या   हिंदू - मुसलमां बनाया था ??

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

tanu thadani चल दुःख दे दे मुझको अपने तनु थदानी

दुःख जाग रहा गजलों में अब, मैं सोया किस्मत सिरहाने !
दिल ने खुद  पे  ले  ली  बातें , अब क्या होगा मौला जाने !

ये  पीठ  पे  घाव  हुआ  कैसे ,कैसे  किस  पे  इल्जाम  रखुं ?
सब ही  तो हंस के  मिलें गले , कैसे  बोलो अब पहचाने ?

मां तेरी प्यार की  लोरी  सा ,मासूम वो लम्हा  ना मिलता ,
अब  मिलते  हैं  हर  ओर  यहाँ , बस छल के ही ताने -बाने !

हम अपनी अपनी गठरी में , दुःख  लाख लिये फिरते रहते ,
हर दर पे गठरी खोल खोल,  लगते हर इक को दिखलाने !

चल  दुःख  दे  दे मुझको अपने , पर शर्त माननी होगी कि ,
तुझसे   भी  दुःख  न पाये कोई,  चाहे जाने  या अनजाने !

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

tanu thadani मैं सूफीयाना हो गया तनु थदानी

कंगाल था , इक नाम से ही ,इक खजाना हो गया !
तुझको  बना  मालिक मैं , बुद्धु से सयाना हो गया !

हाथों  को  उठा  माँगते , सिर  फोड़ते  हर  द्वार पे ,
सब ही तो है फिर ये तो खुद पे ,जुल्म ढाना हो गया !

मैं  मिला  मां  को , मुझे बीबी मिली,  बच्चा मिला ,
सब कह रहे जब तू मिला , तो मैं दीवाना हो गया !

सब  ढुंढ रहे  हैं  तुझे , काशी  से ले अजमेर तक,
अब खुद के भीतर ही गये ,जब इक जमाना हो गया !

जब मैं रहा मैं ही नहीं,फिर दुःख है क्या ओं दर्द क्या?
इस पार से उस पार बस, ये आना -जाना हो गया !

धर्मों की पकड़ से निकल, कोशिश की इंसा होने की
इंसान  ज्यूं  बनता गया , मैं सूफीयाना  हो गया !

तेरी  खुशी  में  गा  रहा  मैं , संग  मेरे  गा  जरा ,  
रोया दुःख में  तु मेरे ,   यूं  सुर  मिलाना हो गया !

सोमवार, 4 नवंबर 2013

tanu thadani ऐ भारत मां

उसे  नेता  क्यूं कहते हो , क्यो  भूले अपने  छालों   को  ?
हमारे  हाथो ही  दे  मारा है  , हमारे  गालों   को  !


यही  कुनबा  है बेशर्मो  का , जिसने  मां  को  ही  लूटा ,
पहन खादी यहाँ सहलाते , लफंगो सा  बालों को !


सलामत हैँ सभी संदर्भ,  जिसकी आड़ ले ले कर,
वो  लेता  छीन  मेरे  भूखे , बच्चो के निवालो  को !

उसे  ठग कहने   वाले , हैं  गलत  ये मैं भी कहता  हूं ,
हैं वो  कातिल कतल करता , हमारे  भोले भालो  को !

समूचे  घर  की सम्पति को वो , घुन  बन के खा  गये ,
कि हम तो  देखते ही  रह  गये , बस  लटके  तालो को !

वो अपनी आत्मा को बेच  के भी , फिर रहें  भूखे ,
वो  बेचेगें  जरूर देखना , अब  अपनी खालों  को !

ऐ भारत मां ! हम ही ने चोर,  संसद मे बिठाये हैं ,
जो  सीना ठोक के अंजाम,  देते  हैं  घोटालों  को !

कि  संसद जब  हमारी भोर  का कानून  इक देगी ,
पियेगें भर के  तब उस भोर में , जीवन  के प्यालों को !