शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

मैंने तो पिया ढूंढ़ लिया hey eshwar-3 (tanu thadani) हे ईश्वर -3 { तनु थदानी }


जिद  की  सलीब  पे   लटक  के  ,  जो  कोई  जीया  !
न  दोस्त  ना  ही  रब  मिला ,जीवन  खतम  किया ! 

वो   दोस्त    मेरी   सादगी   पे  ,  यूँ    फ़िदा   हुआ ,
 मिलता   रहा  फिर  आँख  से , काजल चुरा लिया !

हम   दोस्तों   को   प्यार  यूँ   , करना    सिखायेंगे ,
ज्यों  दूध  में   चुपके  से  ही  , चीनी  मिला   दिया ! 

हर   जानवर   भी  जिस्म से , खुशियाँ   बटोरे   हैं  ,
जिस्मों  से  मोहब्बत किया,तो क्या अलग किया  ? 

गिरना ही  है तो  रब की ,मोहब्बत  में  गिर के देख,
 इसमें   वफ़ा   मिलेगी   ये ,   वादा   रहा    मियाँ  !

मैंने   तो   पिया     ढूंढ़    लिया  , बंद   आँखों   में ,
सब   खोज   रहे  शोर  कर , पिया - पिया -  पिया !
--------------------------------------- तनु थदानी



मंगलवार, 4 सितंबर 2012

विश्वास मानिएं कि hey eshwar-3 (tanu thadani) हे ईश्वर -3 { तनु थदानी }


साँसों  से   ही   जुड़ा   है ,  हमसे   हमारा    नाता !
हम  खुद से  बिछड़  जाते ,जब  भी ये  टूट जाता !  

हम सब प्रतीक्षारत  हैं , आयेगी   बारी  इक दिन 
जाने  की  ही  टिकट  ले  , हर  कोई  यहाँ  आता  !

ये  आदमी   की  हस्ती ,  क्या  एक  बुलबुला  है ?
छोटा   हो   या  बड़ा  हो , सब   फूट -फूट  जाता !  

तू  है   अगर जीवित  तो , बन  नम्रता  का  संगी ,
मुर्दे  ही  अकड़ते  है  , फिर तू  क्यूँ अकड़  खाता ?

आती   न  कोई  चिठ्ठी , ना  कोई   खबर  आती   ,
उस  पार  जो भी  जाता , क्यूँ  लौट कर न  आता ?

ये   मौत   बेवजह   ही  ,  बदनाम   हो   चुकी   है ,
हर  कोई  यहाँ  दुःख तो ,बस  जिन्दगी  से पाता !

होगी   बड़ी  अनोखी  ,  मस्ती   भरी   ये   मृत्यु ,
मिलता है  जो भी उससे ,जीवन  को छोड़  जाता !

विश्वास   मानिएं   कि , बेहतर   ही  जगह  होगी ,
जो  भी   वहां पहुँचता  ,   अपनों को  भूल जाता ! 


रविवार, 2 सितंबर 2012

मुझसे ना छिपाना hey eshwar-3 (tanu thadani) हे ईश्वर -3 { तनु थदानी }


सोया   नहीं  था  रात  भर  , तकिया  है  गवाही !
जिस  पर  से  सिलवटों की  नमी, सूख न पायी !

जिसने  मेरे  विश्वास  को , दम  घोंट  के  मारा ,
क्यूँ    उसके  लिए  रो  के ,  सारी  रात   बिताई ?  

सब  दूर  से   देना  दुआ ,पर   साथ  न   आना ,
मैं  जिस  सफ़र पे हूँ वहां ,मंजिल  है  इक खाई !

कुटिया  में  रोती  एक , बूढी  सी   मेरी  आशा ,
सुराख  कर  के  छत  पे  ,वहां   रौशनी   लायी !

उस  रौशनी  के  साथ  ही, अंधर  जो इक  आया ,
उसमे  ही  शख्सियत  थी  मेरी , बन  गई  राई !

धोखे  की  इक  दरार थी  , झाँका   तो  मर गया ,
था  नग्न  मैं , वजूद  पे   थी ,  जम   गई  काई  !

तुम  मेरे  किस्सों  में , क्यूँ ,खुद को  ढूंढ़  रहे हो ,
मुझसे  ना   छिपाना , जो  आँखे   डबडबा  आई !