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गुरुवार, 14 अगस्त 2025

यहाँ पे सब ही ज्ञानी हैं

किसी को राम के अवगुण कहो तो,चिढ़ वो जाता है !
किसी को ये कहो अल्लाह नहीं है ,भिड़ वो जाता है !

कहीं  वो  भूल  न  जाये , वो  हिन्दू है , इस भारत में ,
तभी  तो  श्राद्ध  में  वो  डाक्टर , पंडे   खिलाता  है !

कभी  जकात  के  खर्चे  का  ब्योरा , माँग कर देखो ,
सुनोगे , दोस्त हो काफिर के जो ,ये सब सिखाता है !

कोई भगवा पहन खुश है , तो कोई टोपी जालीदार,
हमें  इक  वेष  में  वो  टांक  कर , उल्लु  बनाता है !

सबों  के  पास अपने मतलब वाले , ज्ञान सी शै है ,
यहाँ पे सब ही ज्ञानी हैं ,क्यूँ 'तनु ' सिर खपाता है ?
----------------------------  तनु थदानी

बुधवार, 4 जून 2025

चलो, अब घर को चलते हैं

हो गया बहुत कमाना,चलो,अब घर को चलते हैं!
नहीं और दूर न जाना, चलो,अब घर को चलते हैं!

हमारी मर्जियां,  तो खुद हमारी, सांसे न माने,
चलेगा अब न बहाना, चलो,अब घर को चलते हैं!

सुना है शहर में तेरा ,घर बिस्तर है सब छोटा,
तू अपने पैर फैला  ना,चलो,अब घर को चलते हैं!

कहीं बे शक्ल आवाजों की, बातों में न आ जाना,
नहीं मन और भटका ना,चलो,अब घर को चलते हैं!

तुम्हारे गांव में तुमको, सब, तेरे नाम से जाने,
यही बस सबको बताना, चलो,अब घर को चलते हैं!
----------------------------------  तनु थदानी





शुक्रवार, 7 जून 2024

हम ही लाठी, हम कपास

हम ही लाठी, हम कपास, खुद ही को कैसे धुनते ? 
ऊपर से ठंडे रहते , जीवन जीते जलते भुनते  ! 

गले मिला तो रीढ़ नहीं ,आंख कहीं तो नज़र कहीं, 
ऐसे रिश्तेदारों में फंस, हम भी तो पूरे सुन्न थे  ! 

ज्यादा पढ़े लिखे या मूरख , ज्यादा फर्क नहीं होता, 
दोनों इक जैसे हैं होते , दोनों किसी की न सुनते! 

जग जाहिर था चोर है वो,टोपी पहन के खड़ा हुआ, 
बात थी देश चलाने की तो, कैसे भला उसे चुनते ? 
-------------------------------  तनु थदानी

सोमवार, 5 अगस्त 2013

तुम्हारे इश्क में इंसान बनते जा रहे हैं

हमें  ना  पूछना  कि  हँस  नहीं , क्यूँ  पा  रहें  हैं !
हमें   गुजरे   जमाने  याद ,  बरबस   आ  रहें  हैं ! 

किसी  से  मिल के बिछड़ने  से  मिला खालीपन ,
तमाम  जश्न  उसे  क्यूँ  नहीं,  भर   पा  रहें   हैं  ?

जिन्होंने बस  किया व्यापार, हर इक  सूरते-हाल,
वो  हमको प्यार  वाला फ़लसफ़ा,  समझा रहें हैं !  

यूँ  की  तौहीन, जिस्मो  से  हमारा , इश्क तौला ,
हमारे  इश्क  पे  क्यूँ  यूँ  क़हर ,  बरपा   रहें   हैं ? 

मिलो इक बार मकसद हो भले ,बिछड़न ही सही ,  
कतल  उस ख्वाब का कर डाल ,जो  घबड़ा रहें हैं !

कभी  हिंदू  मुसलमा  बन  के , फिरे  थे  यहाँ  पे  ,
तुम्हारे  इश्क   में   इंसान   बनते   जा  रहें   हैं  !

तू  मस्जिद जा,मेरे लिये तो ख़ुदा, वो  ही है  बस ,
मेरे  महबूब  की  अच्छी  ख़बर ,जो  ला   रहें  हैं !

कभी वो दिन भी न आये , कि  हंसू  बिन  तेरे  मैं ,
जमीं  पे  मछलियों   सा  देख ,  छटपटा  रहें   हैं !
----------------------------------  तनु थदानी